Saturday, 18 August 2012

मेट्रो का सफर

 मेट्रो का सफर कभी तो बहुत सुकूनदेह होता है, तो कभी इतना  तकलीफदेह कि कहना मुश्किल है .बस यही लगा रहता है कि जल्दी से गंतव्य आए और  इस डिब्बे से बाहर निकला जाए .लेकिन रोजाना की  बनिस्बत  आज का सफर आरामदायक था . क्योंकि  दोपहर का समय था  और सीट आसानी से मिल गयी थी और फिर .सी की ठंडी  हवा का आनंद जिस से सारी  थकावट  जाती रही.  मैंने अपने बैग से अमृत लाल नागर का उपन्यास  "सुहाग के नुपुर" निकाला  और आराम उसके शेष प्रष्ठ पलटने लगी  .कुछ समय ध्यान उसी में लगा रहा पर अगले स्टॉप पर जो लड़कियाँ चढ़ीं उन्होंने मुझे सीट पर थोड़ा शिफ्ट हो जाने के लिए कहा और जबरदस्ती दोनों लड़कियों ने अपने को तीन सीटों की सीट परपूरी तरह से जमा लिया और हम पहले से बैठे तीन  यात्री परेशान हो उठे . मेरे साथ बैठे दो यात्री भी चुप रहे और तकलीफ झेलते रहे.न मैंने, न उन्होंने ,किसी ने कुछ  कहा. बरबस गाँधी  जी  का पहला बंदर स्मरण हो आया  जो  कहता है कि बुरा मत बोलो. पर अब शायद लोगों ने अपनी इच्छानुसार उसमें संशोधन कर लिया है कि कुछ भी मत बोलो बस अपने काम से मतलब रखो.   महानगरों की यही विशेषता है कि जब कहा जाता है तो पूरा कहा जाता है नहीं तो लोग चुप रहना ज्यादा पसंद करते है;कोई झगडा करे तो चुप ,कोई तकलीफ में हो तो चुप ,किसी का सदस्य मेट्रो के बाहर छूट गया और मेट्रो चल पड़ी तो चुप.मेट्रो में कोई किसी से बात नहीं करता दिखता.अधिकतर युवाओं के कान मोबाइल के  हेडफोन ने बंद कर दिए हैं . गांधी जी का दूसरा बंदर कहता है कि बुरा मत सुनो और बुरा सुनने का आज यह आधुनिक साधन है कि बस मनचाहा रैप और डिस्को सुनो और सब सुनने से बचो.इस तरह दुनिया से कटती और संवेदनहीन होती यह युवा पीढ़ी चिंता का विषय बन रही है .कुछ लड़कियां आंख बंद किये बैठ जाती हैं जिस से कि कोई जरूरतमंद दिखे , ही सीट देने के लिए उठना पड़े और ही कोई शिफ्ट होने के लिए कह सके. गांधी जी का तीसरा बन्दर यही तो कहता है कि बुरा मत देखो. सही है ,जो आराम से वंचित करे; हमारे सुख में बाधा बने वेह आज नई पीढ़ी के लिए बुरा हो गया है इसलिए आँख बंद कर के बैठना ही अधिक उपयुक्त है शायद उनके लिए.
       मेट्रो में अलग ही संस्कृति दिखती है.अधिकतर दिल्लीवासी अपने कार्यस्थल तक  पहुँचने के लिए मेट्रो की सुविधा ही लेते है ये और बात है कि तेज गति और समय से पहुँचाने की सुविधा के अतिरिक्त यह अब और कई कारणों से असुविधाजनक हो रही है और फिर स्थिति कब और बिगड़ जाये ये कहा नहीं जा सकता .एक मेट्रो यदि समय पर नहीं आई तो कश्मीरी गेट और राजीव चौक जैसे स्टेशन पर महाकुम्भ बन जाते हैं . बस फिर आप चल नहीं सकते चलाये जाते हैं ,घसीटे जाते हैं और भीड़ आपकी दिशा कब कहाँ मोड़ दे इसका अंदाजा ही अंदाजे से बाहर है .सुरक्षाकर्मियों की जो व्यवस्था यहाँ दिखती है उनमें कुछ ही इस भीड़ पर नियंत्रण रखने का प्रयास करते दीखते हैं और कुछ का हारा  थका चेहरा देखकर तो लगता है कि अब वे अपनी हार स्वीकार कर चुके  हैं.रोज ड्यूटी पर आने की मजबूरी और इस जनसैलाब में गोते लगाना उनकी नियति बन चुका  है .
          महिलाओं कि सुविधा और सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए मेट्रो कि गति की दिशा के  अनुसार पहला डिब्बा महिलाओं के लिए आरक्षित करना व्यवथा का  निश्चय ही प्रशंसनीय निर्णय था इसके साथ ही महिलाओं का प्रवेश बाकी डिब्बों में भी वर्जित नहीं था .इसकी प्रतिक्रियास्वरुप बाकी  के तीन डब्बों पर पुरुष अपना एकाधिकार समझने लगे.यदि कोई महिला उन डब्बों पर चढ जाये और महिलाओं के लिए आरक्षित सीट कि मांग करने लगे तो कहा जाने लगता है कि  यदि बैठना है तो अपने डिब्बे में जाओ दिल्ली सरकार  ने तुम्हे एक डब्बा दे तो रखा है .पुरुष के इस नकारात्मक और असहयोगपूर्ण  व्यवहार को देखकर बिलकुल लगता है  कि भारतीय पुरुष को उसकी परम्परागत स्त्री उपेक्षित समझ से बाहर निकलना बेहद मुश्किल है .तथाकथित "लेडीस  कोच " में बकायदा घोषणा की  जाती है बल्कि बार बार चेताया जाता  है कि "पुरुष यात्रियों से अनुरोध है कि वे महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में न चढें,ऐसा करना दंडनीय अपराध है"किन्तु  महिलाओं के डिब्बे में चढ़ने वाले पुरुषों को इस अपराध का ही बोध करवाया नहीं जाता उसे दंडनीय कहना  तो बिलकुल हास्यास्पद लगता है .सब मनमानी से होता है .महिलाएं भी विरोध नहीं करतीं चुप ही रहती हैं. मेट्रो का सफर महानगरीय समाज की रामकहानी का लघु संस्करण प्रतीत होता है.     

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