स्त्री पुरुष सम्बंधित प्रत्येक पर्व चाहे वह करवाचौथ हो या फिर रक्षाबंधन में एक समानता यह है कि पुरुष स्त्री की रक्षा करने ,उसे सुरक्षा का वातावरण देने का आश्वासन देता है.पुरुष द्वारा दिए गए इसी आश्वासन से स्त्री हर रूप में उसकी पूजा करती है . थाल सजाकर उसके माथे पर तिलक करती है . शीर्ष पर फूलों की फुहार करती है ..बिलकुल वैसे ही जैसे मंदिर में देवता की पूजा की जाती है . अद्भुत हैं ये त्योहार जो पारस्परिक रिश्तों को और मजबूत करते हैं तथा जिनके होने से संबंधों में भी नई ताजगी का आभास होता है . भाई की कलाई पर प्रेम का धागा जब बहन बाँधती है तो अनायास ही गीत नेपथ्य में गूँजने लगता है.."बहना ने भाई की कलाई पे प्यार बाँधा है..प्यार से सारा संसार बाँधा है "और इसी तरह के अन्य गीत भी स्मरण होने लगते हैं जो विशेष रूप से इसी अवसर के लिए लिखे गए और गाये गए. रोजमर्रा की जिंदगी की भाग दौड़ से थोड़ा आराम देते ये भारतीय पर्व संबंधों की अहमन्यता और उनकी प्राथमिकता का सन्देश समाज तक पहुँचाते हैं
बहन का ह्रदय बहुत संवेदनशील है . भाई कहीं पर भी हो वहाँ तक जाने के लिए और अपने हाथों से राखी का बंधन बाँधने के लिए वह तत्पर हो उठती है. तीज के कुछ ही दिनों के बाद रक्षाबंधन का त्यौहार स्त्री को अपने मायके से जोड़े रखने का महत्व रखता है . या फिर कभी तो ऐसा लगता है कि ये पर्व बेटी की खैर खबर जान लेने के बहाने के रूप में ही अस्तित्व में आए क्योंकि भारतीय परम्परा में तो विवाहित बेटी के घर का भोजन ग्रहण करना भी वर्जित है तो फिर बिना किसी प्रयोजन के वहाँ जाना कैसा होता होगा यह कहने की जरुरत नहीं . कारण कुछ भी रहा हो पर इतना अवश्य है कि रक्षाबंधन का त्यौहार किसी भी बहन के ह्रदय को प्रफुल्लित कर देता है . उसे अपने लाडली होने का एहसास होता है और यह भी कि वह कुछ भी चाह ले बस पूरा हो जायेगा और ऐसा होता भी है; भाई अपनी बहन के लिए उसकी मनचाही वस्तुएँ खरीदता है ,यह बताने का प्रयास करता है कि वह कभी भी अकेली नहीं है भले ही सामाजिक रीति- रिवाज और परम्परा के चलते उसे दूसरे घर विवाहित रूप से भेजा गया किन्तु माता- पिता के घर में उसकी कमी आज भी खलती है . दो परिवारों के स्नेह को ही अपने जीवन का आधार मान लेने वाली स्त्री के लिए स्नेह की अभिवयक्ति के माध्यम ऐसे अवसर सचमुच उसके होने के एहसास को वजन देते हैं .अपनी खुशी को जाहिर करने के लिए वह राखी खरीदने जाती है ..हर राखी में उसे अपने भाई का चेहरा दिखता है और फिर न जाने किस राखी पर आकर उसका मन रुकता है और उसे वह अपने भाई की कलाई के लिए खरीद लेती है
कोई भी सम्बन्ध तभी तक नैसर्गिक सुख दे पाता है जब तक कि वो मांग और पूर्ति का साधन न बने . गणित के आधार पर रिश्ते नहीं चलते किन्तु इसके बरक्स स्थिति यह है की वैयक्तिक इच्छाओं की पूर्ति के इस दौर ने त्योहारों की संवेदना को जकड़ लिया है .वस्तुएँ भावनाओं का विकल्प होती जा रही हैं और ऐसी स्थिति में जो भाई आर्थिक रूप से बहनों की मांग को पूरा नहीं कर पाते उनके लिए इस तरह के पर्व व्यवधान है , अपनी बेहाल स्थिति के प्रति असंतोष का कारण हैं. एक धागे के रूप में भाई के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करने वाले इस त्यौहार का रूप अब बदलता जा रहा है . धागे के साथ अन्य वस्तुएँ भी जुड़ती चली जा रहीं है . बहन राखी भी बाँधती है और साथ में अपने भाई को अब उपहार भी देती है . इस उपहार को देने के भाव ने उनमें अपने भाई से भी कुछ महंगा उपहार ले लेने का भाव जगा दिया है. हार्दिक संवेदना से हट कर यह त्यौहार लेन- देन का ही माध्यम बनता जा रहा है .त्योहारों को मनाने के लिए सही दृष्टिकोण होना जरुरी है. रिवाजों की परम्परा को उपहारों के आदान -प्रदान के परिप्रेक्ष्य में देखना गलत है. इस लेन देन से परे जाकर ही रक्षा के वचन भरे भाव समाज में सौहाद्र का वातावरण
तैयार कर सकते हैं . हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि त्यौहार सामाजिक
मूल्यों और रीति परम्पराओं का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निर्वाह करते
हैं और सामाजिकता तथा पारवारिक संस्था एवं मूल्यों का संरक्षण भी करते
हैं.
ममता धवन
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