Thursday, 23 November 2017

अनकहा-सा
एक और कनुप्रिया

साँवरे...
ये जो शांत नभ में
हर रात्रि
चन्द्र का फेरा है न
इस के प्रतिबिम्ब से
मेरा हृदय
तुझसे जुड़ता है।।
 
रात्रि बेला में जब
इस श्वेत वृत्त को
निहारती हूँ
तो क्या तुम ये समझते हो कि इस भाँति मैं
इसकी शीतलता पर मुग्ध हूँ?
 नहीं मेरे साँवरे

स्तब्ध नील गगन में
चमकता अकेला चन्द्र
जानते हो कैसा लगता है?

जैसे ये विस्तृत नभ मेरा हृदय है
और  हृदय के बीच एकमात्र स्निग्धता तुम्हारे प्रेम की है।

क्या तुम अब भी समझते हो
कि घण्टों मैं श्वेत वृत्त को निहारती हूँ?
नहीं साँवरे।।।

ये जो चन्द्र का फेरा है न
इस के प्रतिबिम्ब से
मेरा हृदय
तुझसे जुड़ता है।।

ममता धवन
एक और कनुप्रिया


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