Thursday, 23 November 2017

अनकहा-सा
एक और कनुप्रिया

साँवरे...
ये जो शांत नभ में
हर रात्रि
चन्द्र का फेरा है न
इस के प्रतिबिम्ब से
मेरा हृदय
तुझसे जुड़ता है।।
 
रात्रि बेला में जब
इस श्वेत वृत्त को
निहारती हूँ
तो क्या तुम ये समझते हो कि इस भाँति मैं
इसकी शीतलता पर मुग्ध हूँ?
 नहीं मेरे साँवरे

स्तब्ध नील गगन में
चमकता अकेला चन्द्र
जानते हो कैसा लगता है?

जैसे ये विस्तृत नभ मेरा हृदय है
और  हृदय के बीच एकमात्र स्निग्धता तुम्हारे प्रेम की है।

क्या तुम अब भी समझते हो
कि घण्टों मैं श्वेत वृत्त को निहारती हूँ?
नहीं साँवरे।।।

ये जो चन्द्र का फेरा है न
इस के प्रतिबिम्ब से
मेरा हृदय
तुझसे जुड़ता है।।

ममता धवन
एक और कनुप्रिया


Thursday, 23 August 2012

रक्षा के धागे

स्त्री पुरुष सम्बंधित प्रत्येक पर्व चाहे वह करवाचौथ हो या फिर रक्षाबंधन  में एक समानता यह  है कि पुरुष स्त्री की रक्षा करने ,उसे सुरक्षा का वातावरण देने का आश्वासन देता है.पुरुष द्वारा दिए गए इसी आश्वासन से स्त्री हर रूप में उसकी पूजा करती है . थाल सजाकर उसके माथे पर तिलक करती है . शीर्ष पर फूलों की  फुहार करती है ..बिलकुल वैसे ही जैसे मंदिर में देवता की पूजा  की  जाती है . अद्भुत हैं ये त्योहार  जो पारस्परिक रिश्तों को और मजबूत करते हैं तथा जिनके होने से संबंधों में भी नई ताजगी  का आभास होता है . भाई की  कलाई पर प्रेम का धागा जब बहन बाँधती है तो अनायास ही गीत नेपथ्य में गूँजने लगता है.."बहना ने भाई की  कलाई पे प्यार बाँधा  है..प्यार से सारा संसार बाँधा है "और इसी तरह के अन्य गीत भी स्मरण  होने लगते हैं जो विशेष रूप से इसी अवसर के लिए लिखे गए और गाये गए. रोजमर्रा की जिंदगी की भाग दौड़ से थोड़ा आराम देते ये भारतीय पर्व संबंधों की अहमन्यता  और उनकी प्राथमिकता का सन्देश समाज तक पहुँचाते हैं
बहन  का ह्रदय बहुत संवेदनशील है . भाई कहीं पर भी हो वहाँ तक जाने के लिए और अपने हाथों से राखी का बंधन बाँधने के लिए वह तत्पर हो उठती है. तीज के कुछ ही दिनों के बाद रक्षाबंधन का त्यौहार स्त्री को अपने मायके से जोड़े रखने का महत्व  रखता है . या फिर कभी तो ऐसा लगता है कि ये पर्व बेटी की खैर खबर जान  लेने के बहाने के रूप में ही अस्तित्व में आए  क्योंकि  भारतीय परम्परा में तो विवाहित बेटी के घर का भोजन ग्रहण करना भी वर्जित है तो फिर बिना किसी प्रयोजन के वहाँ जाना कैसा होता होगा यह कहने की जरुरत नहीं . कारण  कुछ भी रहा हो पर इतना अवश्य है कि रक्षाबंधन का त्यौहार किसी भी बहन के ह्रदय को प्रफुल्लित कर देता है . उसे अपने लाडली होने का एहसास होता है और यह भी कि  वह कुछ भी चाह ले बस पूरा हो जायेगा और ऐसा होता भी है; भाई अपनी बहन के लिए उसकी मनचाही वस्तुएँ खरीदता है ,यह बताने का प्रयास करता है कि वह कभी भी अकेली नहीं है भले ही सामाजिक रीति- रिवाज और परम्परा के चलते उसे दूसरे घर विवाहित रूप से भेजा गया किन्तु माता- पिता के घर में उसकी  कमी आज भी खलती है . दो परिवारों के स्नेह को ही अपने जीवन का आधार मान लेने वाली स्त्री के लिए स्नेह की अभिवयक्ति के माध्यम ऐसे अवसर सचमुच उसके होने के एहसास को वजन देते हैं .अपनी खुशी को जाहिर करने के लिए वह राखी खरीदने जाती है ..हर राखी में उसे अपने भाई का चेहरा दिखता है और फिर जाने किस राखी पर आकर  उसका मन रुकता है और उसे वह अपने भाई की  कलाई के लिए खरीद लेती है
कोई भी सम्बन्ध तभी तक नैसर्गिक सुख दे पाता  है जब तक कि वो मांग और पूर्ति का  साधन बने . गणित के आधार पर रिश्ते नहीं चलते किन्तु इसके बरक्स स्थिति यह है की वैयक्तिक इच्छाओं की पूर्ति के इस दौर ने त्योहारों  की संवेदना को जकड़ लिया है .वस्तुएँ भावनाओं का विकल्प होती जा रही हैं और ऐसी स्थिति में जो भाई आर्थिक रूप से बहनों की मांग को पूरा नहीं कर पाते  उनके लिए इस तरह के पर्व व्यवधान है , अपनी  बेहाल  स्थिति के प्रति असंतोष का कारण हैं. एक धागे के रूप में भाई के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करने वाले इस त्यौहार का रूप अब बदलता जा रहा है . धागे के साथ अन्य वस्तुएँ भी जुड़ती चली जा रहीं है . बहन राखी भी बाँधती  है और साथ में अपने भाई को अब उपहार  भी देती है . इस उपहार को देने के भाव ने उनमें  अपने भाई से भी  कुछ महंगा  उपहार  ले लेने का भाव जगा दिया है. हार्दिक संवेदना से हट कर यह त्यौहार लेन- देन का ही माध्यम बनता जा रहा है .त्योहारों को मनाने के लिए सही दृष्टिकोण होना जरुरी है. रिवाजों की परम्परा को उपहारों के आदान -प्रदान के परिप्रेक्ष्य में देखना गलत है. इस लेन देन से परे जाकर ही रक्षा के वचन भरे भाव  समाज में सौहाद्र का वातावरण तैयार कर सकते हैं . हमें यह नहीं  भूलना  चाहिए  कि त्यौहार सामाजिक मूल्यों और रीति परम्पराओं का एक पीढ़ी  से दूसरी पीढ़ी  तक निर्वाह करते हैं और सामाजिकता तथा पारवारिक संस्था एवं मूल्यों का संरक्षण भी करते हैं.
ममता धवन 

Saturday, 18 August 2012

मेट्रो का सफर

 मेट्रो का सफर कभी तो बहुत सुकूनदेह होता है, तो कभी इतना  तकलीफदेह कि कहना मुश्किल है .बस यही लगा रहता है कि जल्दी से गंतव्य आए और  इस डिब्बे से बाहर निकला जाए .लेकिन रोजाना की  बनिस्बत  आज का सफर आरामदायक था . क्योंकि  दोपहर का समय था  और सीट आसानी से मिल गयी थी और फिर .सी की ठंडी  हवा का आनंद जिस से सारी  थकावट  जाती रही.  मैंने अपने बैग से अमृत लाल नागर का उपन्यास  "सुहाग के नुपुर" निकाला  और आराम उसके शेष प्रष्ठ पलटने लगी  .कुछ समय ध्यान उसी में लगा रहा पर अगले स्टॉप पर जो लड़कियाँ चढ़ीं उन्होंने मुझे सीट पर थोड़ा शिफ्ट हो जाने के लिए कहा और जबरदस्ती दोनों लड़कियों ने अपने को तीन सीटों की सीट परपूरी तरह से जमा लिया और हम पहले से बैठे तीन  यात्री परेशान हो उठे . मेरे साथ बैठे दो यात्री भी चुप रहे और तकलीफ झेलते रहे.न मैंने, न उन्होंने ,किसी ने कुछ  कहा. बरबस गाँधी  जी  का पहला बंदर स्मरण हो आया  जो  कहता है कि बुरा मत बोलो. पर अब शायद लोगों ने अपनी इच्छानुसार उसमें संशोधन कर लिया है कि कुछ भी मत बोलो बस अपने काम से मतलब रखो.   महानगरों की यही विशेषता है कि जब कहा जाता है तो पूरा कहा जाता है नहीं तो लोग चुप रहना ज्यादा पसंद करते है;कोई झगडा करे तो चुप ,कोई तकलीफ में हो तो चुप ,किसी का सदस्य मेट्रो के बाहर छूट गया और मेट्रो चल पड़ी तो चुप.मेट्रो में कोई किसी से बात नहीं करता दिखता.अधिकतर युवाओं के कान मोबाइल के  हेडफोन ने बंद कर दिए हैं . गांधी जी का दूसरा बंदर कहता है कि बुरा मत सुनो और बुरा सुनने का आज यह आधुनिक साधन है कि बस मनचाहा रैप और डिस्को सुनो और सब सुनने से बचो.इस तरह दुनिया से कटती और संवेदनहीन होती यह युवा पीढ़ी चिंता का विषय बन रही है .कुछ लड़कियां आंख बंद किये बैठ जाती हैं जिस से कि कोई जरूरतमंद दिखे , ही सीट देने के लिए उठना पड़े और ही कोई शिफ्ट होने के लिए कह सके. गांधी जी का तीसरा बन्दर यही तो कहता है कि बुरा मत देखो. सही है ,जो आराम से वंचित करे; हमारे सुख में बाधा बने वेह आज नई पीढ़ी के लिए बुरा हो गया है इसलिए आँख बंद कर के बैठना ही अधिक उपयुक्त है शायद उनके लिए.
       मेट्रो में अलग ही संस्कृति दिखती है.अधिकतर दिल्लीवासी अपने कार्यस्थल तक  पहुँचने के लिए मेट्रो की सुविधा ही लेते है ये और बात है कि तेज गति और समय से पहुँचाने की सुविधा के अतिरिक्त यह अब और कई कारणों से असुविधाजनक हो रही है और फिर स्थिति कब और बिगड़ जाये ये कहा नहीं जा सकता .एक मेट्रो यदि समय पर नहीं आई तो कश्मीरी गेट और राजीव चौक जैसे स्टेशन पर महाकुम्भ बन जाते हैं . बस फिर आप चल नहीं सकते चलाये जाते हैं ,घसीटे जाते हैं और भीड़ आपकी दिशा कब कहाँ मोड़ दे इसका अंदाजा ही अंदाजे से बाहर है .सुरक्षाकर्मियों की जो व्यवस्था यहाँ दिखती है उनमें कुछ ही इस भीड़ पर नियंत्रण रखने का प्रयास करते दीखते हैं और कुछ का हारा  थका चेहरा देखकर तो लगता है कि अब वे अपनी हार स्वीकार कर चुके  हैं.रोज ड्यूटी पर आने की मजबूरी और इस जनसैलाब में गोते लगाना उनकी नियति बन चुका  है .
          महिलाओं कि सुविधा और सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए मेट्रो कि गति की दिशा के  अनुसार पहला डिब्बा महिलाओं के लिए आरक्षित करना व्यवथा का  निश्चय ही प्रशंसनीय निर्णय था इसके साथ ही महिलाओं का प्रवेश बाकी डिब्बों में भी वर्जित नहीं था .इसकी प्रतिक्रियास्वरुप बाकी  के तीन डब्बों पर पुरुष अपना एकाधिकार समझने लगे.यदि कोई महिला उन डब्बों पर चढ जाये और महिलाओं के लिए आरक्षित सीट कि मांग करने लगे तो कहा जाने लगता है कि  यदि बैठना है तो अपने डिब्बे में जाओ दिल्ली सरकार  ने तुम्हे एक डब्बा दे तो रखा है .पुरुष के इस नकारात्मक और असहयोगपूर्ण  व्यवहार को देखकर बिलकुल लगता है  कि भारतीय पुरुष को उसकी परम्परागत स्त्री उपेक्षित समझ से बाहर निकलना बेहद मुश्किल है .तथाकथित "लेडीस  कोच " में बकायदा घोषणा की  जाती है बल्कि बार बार चेताया जाता  है कि "पुरुष यात्रियों से अनुरोध है कि वे महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में न चढें,ऐसा करना दंडनीय अपराध है"किन्तु  महिलाओं के डिब्बे में चढ़ने वाले पुरुषों को इस अपराध का ही बोध करवाया नहीं जाता उसे दंडनीय कहना  तो बिलकुल हास्यास्पद लगता है .सब मनमानी से होता है .महिलाएं भी विरोध नहीं करतीं चुप ही रहती हैं. मेट्रो का सफर महानगरीय समाज की रामकहानी का लघु संस्करण प्रतीत होता है.